नये साल में नया रूप धर मौसम आया है,कहीं खुशी है और कहीं पर मातम छाया है।
वीतराग होनेका जिनको मिला नहीं आनन्द,टाँग खींचना जिनकी फितरत करें सदा छल छंद।
कुर्सी से चिपके रहने की आदत जिनको पड़ी,उनके चेहरे उतरे उतरे उनकी पीर बढ़ी।
कहीं धर्म की राजनीति है कहीं धर्म बदरंग,कहीं भागवत कहीं पे आज़म कहीं विहिप बजरंग।
शरद मुलायम लालू यादव चौटाला व नितीश,समधी साले यार पुराने आपस में छत्तीस।
एक साथ मिल चले बदलने भारत की तस्वीर,सब परिवारवाद के मारे जातीवादी वीर।।
वादी की रंगीनी देखो उल्टी बही बयार,साठ साल में जो न हो सका वही हुआ इस बार।
काँग्रेस की लुटिया डूबी डूब गयी कांफ्रेंस,डल के जल में कमल खिल उठा बिगड़ गया बैलेंस।
झारखंड में बहुमत पाकर मोदी हुये प्रसन्न,राहुल और सोनिया सारी काँग्रेस है सन्न।
बर्फीली चादर पर क्योंकर खिला कमल का फूल,सोचो राहुल और उमर से जनता क्यों प्रतिकूल।
काँग्रेस की चादर क्योंकर सिमट रही सब ओर,महाराष्ट्र हरियाणा दिल्ली जम्मू औ कश्मीर।
अरे कोयले की खानों में हीरा चमक उठा,दिल्ली क्यों कर रूठी रूठी झारखंड क्यों लुटा।।
जो जनता से कटा रहेगा समझे उसे असामी,जो जनता को लूटलूट कर जेब भरे मनमानी।
जो अंधे बन बन कर बाँटें अपनों को ही रोटी,चचा भतीजे जिनकी जनता या फिर बेटा बेटी।
बेटी लूटे या दमादजी बेचें जमीं बग़ीचे,उन्हें कमीशन से मतलब है बेचो दरी ग़लीचे।
इनका बस चलता तो सारा बिक जाता कश्मीर,मंदिर मस्ज़िद बिकते बिकता भारत माँ का चीर।।
इनके तो थोड़े हैं ज़्यादा पुरखों के हैं पाप,विल्हण कल्हण को दफ़ना कर बैठे हैं चुप चाप।
उद्भट अभिनवगुप्त न आये इनको कभी पसन्द,पृथ्वीराज न इनको पचते ये तो हैं जयचन्द।
इन्हें राम या भरतलाल का पता नहीं इतिहास,ये राणा का और शिवा का करते हैं उपहास।
राम गये बनवास त्याग कर अवधपुरी का राज्य,भरत त्याग की मूर्ति बन गये तज कर वह साम्राज्य।
भारत की ऐसी संस्कृति से जिन्हें रहा न लगाव,जो सत्ता के भूखे जिनको बस कुर्सी का चाव।
जो गाँधी के रामराज्य का समझ न पाये राज,उनके हिस्से अब रोना है ये हैं कौवे बाज ।।
वीतराग होनेका जिनको मिला नहीं आनन्द,टाँग खींचना जिनकी फितरत करें सदा छल छंद।
कुर्सी से चिपके रहने की आदत जिनको पड़ी,उनके चेहरे उतरे उतरे उनकी पीर बढ़ी।
कहीं धर्म की राजनीति है कहीं धर्म बदरंग,कहीं भागवत कहीं पे आज़म कहीं विहिप बजरंग।
शरद मुलायम लालू यादव चौटाला व नितीश,समधी साले यार पुराने आपस में छत्तीस।
एक साथ मिल चले बदलने भारत की तस्वीर,सब परिवारवाद के मारे जातीवादी वीर।।
वादी की रंगीनी देखो उल्टी बही बयार,साठ साल में जो न हो सका वही हुआ इस बार।
काँग्रेस की लुटिया डूबी डूब गयी कांफ्रेंस,डल के जल में कमल खिल उठा बिगड़ गया बैलेंस।
झारखंड में बहुमत पाकर मोदी हुये प्रसन्न,राहुल और सोनिया सारी काँग्रेस है सन्न।
बर्फीली चादर पर क्योंकर खिला कमल का फूल,सोचो राहुल और उमर से जनता क्यों प्रतिकूल।
काँग्रेस की चादर क्योंकर सिमट रही सब ओर,महाराष्ट्र हरियाणा दिल्ली जम्मू औ कश्मीर।
अरे कोयले की खानों में हीरा चमक उठा,दिल्ली क्यों कर रूठी रूठी झारखंड क्यों लुटा।।
जो जनता से कटा रहेगा समझे उसे असामी,जो जनता को लूटलूट कर जेब भरे मनमानी।
जो अंधे बन बन कर बाँटें अपनों को ही रोटी,चचा भतीजे जिनकी जनता या फिर बेटा बेटी।
बेटी लूटे या दमादजी बेचें जमीं बग़ीचे,उन्हें कमीशन से मतलब है बेचो दरी ग़लीचे।
इनका बस चलता तो सारा बिक जाता कश्मीर,मंदिर मस्ज़िद बिकते बिकता भारत माँ का चीर।।
इनके तो थोड़े हैं ज़्यादा पुरखों के हैं पाप,विल्हण कल्हण को दफ़ना कर बैठे हैं चुप चाप।
उद्भट अभिनवगुप्त न आये इनको कभी पसन्द,पृथ्वीराज न इनको पचते ये तो हैं जयचन्द।
इन्हें राम या भरतलाल का पता नहीं इतिहास,ये राणा का और शिवा का करते हैं उपहास।
राम गये बनवास त्याग कर अवधपुरी का राज्य,भरत त्याग की मूर्ति बन गये तज कर वह साम्राज्य।
भारत की ऐसी संस्कृति से जिन्हें रहा न लगाव,जो सत्ता के भूखे जिनको बस कुर्सी का चाव।
जो गाँधी के रामराज्य का समझ न पाये राज,उनके हिस्से अब रोना है ये हैं कौवे बाज ।।
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