Sunday, December 28, 2014

आओ मिलकर दिया जलायें

अटलजी की स्मृति के साथ,उन्हें ही समर्पित ः

नवविहान की आहट पाकर तरुणाई ने ली ्अंगड़ाई,
आशाओं ने पंख पसारे पोर पोर छाई अमराई।
हमने जो भी ज्योतित पाया वह सर्वस्व लुटाते जायें,
आओ मिल कर दिया जलायें।

पग पग पर अंकुरित बीज को नई फसल का इंतज़ार है,
शाख शाख चिड़यों का डेरा और घोसलों में बहार है,
चूँ चूँ  चों चों चारा चुगते नन्हें पर फैला कर गायें,
आओ मिल कर दिया जलायें।

कोने में अलाव तो है पर अंगारों पर राख चढ़ी है,
राजनीति के सुन्दर तन पर बटमारों की नज़र गड़ी है,
पहचानो ये वही दरिन्दे कसम वफ़दारी की खायें-
इनको मिल कर परे हटायें,
आओ मिल कर दिया जलायें।

हरियाली चुक गयी चतुर्दिक् मौसम की मारा मारी है,
धरती का सीना चटका है मुरझाई क्यारी क्यारी है,
तपन मिटाने का मन हो तो चलो चलें कुछ पेड़ लगायें,
आओ मिल कर दिया जलायें।

उमस बढ़ी तो बरखा होगी तर होगा तन मन का कोना,
मिटे धरा की जब निर्धनता रुक जायेगा रोना धोना,
जल से भरा सरोवर तट है हर कोने में कमल खिलायें,
आओ मिल कर दिया जलायें।।

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